एहसास दिलों का जो लिखा हमने ।
अपना सा लगेगा जो पढ़ा तुमने ।।
।। कल्पना।।
(1)
दहकते हुए सूरज की गर्मी हो तुम ।
पूनम के चांद की नरमी हो तुम ।।
मेरी तन्हाईयों में बसने वाली।
सितारों की झिलमिल से बनी हो तुम।।
(2)
तुझे देखूं तो दिल मचलता है मेरा।
सांसो की गर्मियों से दिल पिघलता है मेरा ।।
नशे में झूमती आंखों की कसम ।
दबाया है सीने में फिर भी दिल धड़कता है मेरा।।
(3)
हर शाम मेरे पास आती हो तुम ।
खामोश मेरी तन्हाई को मिटाती हो तुम।
एहसास है मुझे तेरी मौजूदगी का।
फिजाओं में खुशबू बन आई हो तुम ।।
(4)
सांसों के रास्ते दिल में समा जाती हो तुम।
आंखें जो बंद कर लूं सामने आ जाती हो तुम।।
मेरी जिंदगी का सपना हो या हकीकत ।
आंखों को खोलते ही ओझल हो जाती हो तुम।।
(5)
रोज सपनों में आ जाती हो तुम ।
दर्द दिल का बड़ा जाती हो तुम ।।
मेरे सपनों की दुनिया है तुम्हारे लिए ।
हकीकत की रोशनी में कहीं खो जाती हो तुम।।
(6)
महसूस किया है खामोशी मैं तुम्हें ।
शाम की शीतलता रात की गहराई में तुम्हें ।।
हर पल मेरी जिंदगी का एक राज हो तुम ।
मिलता हूं और शाम फिर भी खास हो तुम ।।
हर वक्त रहती हो मेरे पास ।
मेरी दोस्ती मेरे हमराज हो तुम।।
(7)
मैंने तुम्हें ढूंढा है सांसों की गहराइयों में,
रूह में मेरी समाई हो तुम।
तुम्हें ख्वाब कहूं या जिंदगी मेरी ,
कोई और नहीं मेरी "तन्हाई" हो तुम।।
प्राकृतिक को दर्शाती यह कविता बहुत ही मनोहर
गरर गरर नदी के धारा, चले पवन की चाल ।
घनन घनन गरजे बदरवा, बिजली गिरी पाताल ।।
पर्वत ऊपरे बहें धाराएं, लुढ़क रहे पाषाण ।
वृक्ष धरा को चूमते, तोडें अपना मान ।।
पवन देव के रोस से, टूटे वृक्ष तमाम ।
जो प्रकृति के बीच में, छिड गयो संग्राम ।।
बहे चले वृक्ष बड़े, बीच नदी की धार ।
मांझी नदी के पाट पर, बैठे लिये पतवार ।।
नदी सरासर बह रही, करके चोंडो पाठ।
जों उमड पढ़ो, सागर कोई विराट ।।
झर झर झर झर आसमान से, मेघ करें बौछार ।
वृक्ष लताएं टूटती, जब पड़े जल की मार ।।
सिलाओं में चली दरारें, पलट पलट कई बार ।
आसमानी नीर ने, करी धरा भरमार।।
!!पहली बारिश का प्राकृतिक अवलोकन!!
धनन धनन मेघा गरजे ,आनंद होत अति।
चातक खग पशु प्यास बुझाऐं, हरि होत धरती ।।
जलाशयों में भंवर पड़े, मेघ डोलत हैं अति ।
मंद मंद वायु बहती, पक्षी गुंजन करें अति ।।
शीतल पवन चल रही, पानी रही बहाए ।
तरुवर पत्ते झूम रहे, सरगम रहे बनाएं ।।
सज रहे फल फूलबाडी, खिल रहे सब फूल ।
भवरे गुंजन कर रहे ,भेदें प्रेम का शूल ।।
देख प्रकृति भेष को , मेरा मन बोराए ।
जो कोडी भेष को, कामदेव मिल जाए ।।
मैदानों में घास हरी , ओश बुंद रही मंडराया ।
प्रातकाल रवि किरण पड़े, मोती सी बन जाए ।।
नव में खग उड़ रहे, फटो मेघ हो जाए ।
ऐसी रैली चल रही, जो तरुवर पत्ते उड़ाए ।।
लाल किरणें ढल रही, बादल नहीं छुपाए ।
तारे अंवर में खिले, चांदनी रहे बढ़ाएं ।।
प्रकाश धीरे बुझ रहा , रात्रि गोद फैलाए ।
थक कर चूर हुए जन को , सुकून रहीं पहुंचाए ।।
निशा बड़ी सुखदाईनी , शीतलता बरसाए ।
जीवो को ले गोद में , प्रेम से रही सुलाए।।
लोरियां बच्चे सुने , थपकी माता लगाए ।
निंदिया आंखों में बसे , रात्रि उन्हें सुलाए ।।
तारे झिलमिल कर रहे , चांद रहा लुभाय ।
प्रेम में पागल हुआ चकोर , पावक विच समाय ।।
वातावरण तो शांत है , मेंढक रहे ठरराय ।
ठंडी ठंडी पवन चले , शितल तन हो जाए ।।
साधु-संत साधना करते , योग रहे बढ़ाए ।
रात्रि मैया कृपा करे , दूगना फल मिल जाए ।।
रात्रि पंख पसार के , अंधकार रही बड़ाय ।
समय जगा निशाचरों का , मेरो मन घबराए ।।
रात्रि मुझसे कह रही , तू क्यों रहा भय खाय ।
सुख सपनों को देख तू , रक्षा करेगी माय ।।
चातक खग पशु प्यास बुझाऐं, हरि होत धरती ।।
जलाशयों में भंवर पड़े, मेघ डोलत हैं अति ।
मंद मंद वायु बहती, पक्षी गुंजन करें अति ।।
शीतल पवन चल रही, पानी रही बहाए ।
तरुवर पत्ते झूम रहे, सरगम रहे बनाएं ।।
सज रहे फल फूलबाडी, खिल रहे सब फूल ।
भवरे गुंजन कर रहे ,भेदें प्रेम का शूल ।।
देख प्रकृति भेष को , मेरा मन बोराए ।
जो कोडी भेष को, कामदेव मिल जाए ।।
मैदानों में घास हरी , ओश बुंद रही मंडराया ।
प्रातकाल रवि किरण पड़े, मोती सी बन जाए ।।
नव में खग उड़ रहे, फटो मेघ हो जाए ।
ऐसी रैली चल रही, जो तरुवर पत्ते उड़ाए ।।
!! रात की कविता !!
लाल किरणें ढल रही, बादल नहीं छुपाए ।
तारे अंवर में खिले, चांदनी रहे बढ़ाएं ।।
प्रकाश धीरे बुझ रहा , रात्रि गोद फैलाए ।
थक कर चूर हुए जन को , सुकून रहीं पहुंचाए ।।
निशा बड़ी सुखदाईनी , शीतलता बरसाए ।
जीवो को ले गोद में , प्रेम से रही सुलाए।।
लोरियां बच्चे सुने , थपकी माता लगाए ।
निंदिया आंखों में बसे , रात्रि उन्हें सुलाए ।।
तारे झिलमिल कर रहे , चांद रहा लुभाय ।
प्रेम में पागल हुआ चकोर , पावक विच समाय ।।
वातावरण तो शांत है , मेंढक रहे ठरराय ।
ठंडी ठंडी पवन चले , शितल तन हो जाए ।।
साधु-संत साधना करते , योग रहे बढ़ाए ।
रात्रि मैया कृपा करे , दूगना फल मिल जाए ।।
रात्रि पंख पसार के , अंधकार रही बड़ाय ।
समय जगा निशाचरों का , मेरो मन घबराए ।।
रात्रि मुझसे कह रही , तू क्यों रहा भय खाय ।
सुख सपनों को देख तू , रक्षा करेगी माय ।।
!! दर्द दिवाने का !!
अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे ।मैं बहुत देर यूं ही चलता रहा , तुम बहुत देर तक याद आते रहे ।।
जहर मिलता रहा जहर पीते रहे ।
रोज जीते रहे, रोज मरते रहे ।।
जिंदगी भी हमें आजमाती रही ।
और हम भी आजमाते रहे ।।
जख्म जब भी कोई दिल पर लगा ।
जिंदगी की तरफ एक बगीचा खिला ।।
हमारे जख्मों पर वो नमक लगाते रहे ।
चोट लगती रही चोट लगती रही , और हम गुनगुनाते रहे ।।
मुस्कुराते रहे ।।
सोचा था तेरे शहर में साथ रहने को , तेरे शहर में भी न रह सका ।
अपनी जुदाई भी इतनी अजीब थी , अलविदा भी न कह सका ।।
!! आज की दुनिया का सच !!
कलेजा जाए बैठा मेरा , कहीं नहीं जाए यह बात ।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
गऊ सालों में हुए घुटाले , कही हुई हड़ताल ।
कहीं किसी का घर है उजड़ा , पड़ी पेट पर लात ।।
शक्तिशाली धन्यवाद और , गरीब हुए लाचार ।
ऐसी है अब यहां की रिति , ऐसे हुए यहां हालात ।।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
साधु-संतों को कोई न पूजे, घर देवों में पढ़ती लात ।
घर की लक्ष्मी चौराहे पर , बाला नाच करे दिन-रात ।।
ऐसे है समाज की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।
ऐसी हो गई देश की हालत, ऐसे हुए यहां हालात ।।
प्यासे को कोई पानी न दे , रोते को कोई न दे प्यार ।
साधुऔ को भोजन न मिलते , दान करे न कोई यार ।।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे , कौन सुने मेरी फरियाद ।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
भाई भाई को मारेपीटे , प्रेम की रही नहीं कहीं आस ।
नमक रगड़ते है जख्मों पर , दवा नहीं किसी के पास ।।
जिसकी लाठी उसकी भैंस , ऐसे हुए यहां हालात ।
ऐसे हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
झूठ ही लेना झूठ ही देना , मारा गया स्वाभीमान ।
गरीबों की कोई न सुनता , राज करे यहां धनवान ।।
घर घर में भेदी है जन्मे , कैसे बचे अब घर की लाज । ऐसी हो गई रेस की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
बेटी का जब शादी आई , पड़ी बाप पर दहेज की मार ।
जाने कितने हुए बर्वाद , बेटी वाले यह परिवार ।।आगों में जलती बहुओं की , अब कौन सुने फरियाद ।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
पाकिस्तान देश पड़ोसी, हमको दिखा रहा है आंख ।
पास नहीं खाने को रोटी , उड़ा रहा बारूदी राख ।।धोखे कर कर मारे सैनिक, उखाड़ दिए पुराने घाव ।
संसद में बैठे है नपुंसक, कौन सुने मेरी फरियाद ।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।
है कोई जो सुन ले भैया , रविंद फौजी की फरियाद ।
ऐसी हो गई देश की हालत , ऐसे हुए यहां हालात ।।!! राखि एक बंधन !!
कच्चे धागों की एक डोर , अटूट कसम बंधवाय ।भाई बहन की करें रक्षा , यही हमें बताय ।।
सात समंदर दूर हो भाई , तो भी खींच के लाय ।
रक्षाबंधन पर भाई बहन को , दे मिल वाय ।।
लड़ते झगड़ते बचपन बीता , प्यार दिनोंदिन गहराय ।
एक दिन आए जीवन में , वक्त इन्हें बिछुडाय ।।
एक रिश्ते में छिपे हुए, कई रिश्ते हैं मिल वाय ।
बड़ी बहन माता रूप में , भाई पिता बन जाय ।।
डोली में जब बैठी बहना , अक्ष नीर बहाए ।
बचपन की सारी यादों की , एक झलक दिखाएं ।।
दुनिया के सारे रिश्ते में , पवित्र यह लागे मोय ।
साल भर में एक बार ही , रक्षाबंधन होय ।।
भाई बहन के प्यार की , याद हमें दिलवाए ।बरसों के बाद भी , भाई-बहन को मिलाएं ।।
देखकर सावन पर्व महान , मेरो मन इठलाय ।
धन्य कहूं रक्षाबंधन को , भाई बहन को मिलाय ।।
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